Pik Vima : भारत कृषि प्रधान देश होने का तमगा अपने नाम करता है। लेकिन कृषि प्रधान देश की रीढ़ कहे जाने वाले बलिराजा असमानी और सल्तनत संकटों से अभिभूत हो रहे हैं।

प्राकृतिक आपदाओं से किसानों को भारी नुकसान होता है, इस साल भी बारिश की अनियमितता से खरीप सीजन की फसलों को भारी नुकसान हुआ है| राज्य सरकार ने भले ही मदद का ऐलान कर दिया हो, लेकिन ज्यादातर किसानों को मदद नहीं मिली है|

फसल बीमा कराने वाले किसानों का भी फसल बीमा कंपनियां मजाक उड़ा रही हैं। इससे किसानों को देश जाना पड़ रहा है।

जहां हजारों रुपए का नुकसान हुआ है वहीं किसानों को 50-60 रुपए मुआवजा दिया जा रहा है। भंडारा जिले में फसल बीमा कंपनियों का यह अराजक प्रबंधन सामने आया है। हालांकि, जिले के मौजे मोहड़ी के विश्वास पाटिल नाम के एक किसान को 60 रुपये का फसल बीमा मुआवजा मिला है।

इससे किसानों द्वारा यह सवाल उठाया जा रहा है कि फसल बीमा किसानों का है या फसल बीमा कंपनियों का। विश्वास पाटिल ने खरीफ सीजन में अपने तीन एकड़ क्षेत्र में धान लगाया। इसके लिए उन्होंने 50 हजार रुपए खर्च किए थे। उन्होंने इसके लिए फसल बीमा भी लिया था।

सितंबर और अक्टूबर के महीनों के दौरान, महाराष्ट्र में हर जगह भारी बारिश देखी गई और यह भंडारा जिले में भी दर्ज की गई। विश्वास की तीन एकड़ में लगी धान की फसल को नुकसान हुआ है। फसल बीमा निकाले जाने पर उन्होंने संबंधित फसल बीमा कंपनी को अग्रिम सूचना दे दी। उसी के अनुसार पंचनामा किया गया।

अब प्राकृतिक आपदा से नुकसान हो चुका था लेकिन किसान को लगा कि फसल बीमा कंपनियों से उसे मुआवजा मिलेगा और उसे राहत मिलेगी। लेकिन हुआ कुछ और और कंपनी ने सिर्फ 60 रुपये का मुआवजा दिया|

इससे किसानों ने गुस्से में सवाल खड़ा कर दिया है कि इतनी राशि से क्या अचार बनाया जाए। 50 हजार रुपए खर्च कर धान की फसल लगाई गई। उन्होंने सवाल उठाया है कि बीमा के लिए 820 रुपये प्रीमियम देने के बाद अब 60 रुपये मुआवजे के रूप में मिले हैं तो बलीराजा को कंपनियां परेशान कर रही हैं|

इस बीच विश्वास पाटिल इशारे के तौर पर मिले इस मुआवजे को पिक इंश्योरेंस कंपनी को लौटाने जा रहे हैं। बेशक एक तरफ प्राकृतिक आपदाओं से किसानों को नुकसान हो रहा है और फसल बीमा कंपनियां घटिया बीमा कराकर जख्मों पर नमक छिड़क रही हैं।

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