Fish Farming : : पिछले कुछ वर्षों में, भारत में मछली पालन व्यवसाय क्षेत्र में भारी बदलाव आया है। मत्स्य पालन क्षेत्र का विस्तार हुआ है। भारत सरकार मछली पालन यानी किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए कई योजनाएं लागू कर रही है।

इस योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में मछली पालन को प्रोत्साहित करने के लिए भारत सरकार द्वारा किसानों (Farmer) को बैंक ऋण, सब्सिडी और बीमा आदि जैसी विभिन्न सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं। मत्स्य क्षेत्र (Fish Farming Business)के विस्तार के लिए नीली क्रांति योजना (Scheme) लागू की जा रही है।

नीली क्रांति को और अधिक मजबूती और आधुनिकता देने के लिए अब मछली पालन के लिए बायोफ्लोक मछली पालन को अपनाया जा रहा है। इस तकनीक में आपको मछली पालन के लिए तालाब बनाने की जरूरत नहीं है। इस तकनीक ने मछली पालन को आसान और सरल बना दिया है।

इस तकनीक को अपनाकर किसान अधिक आय (Farmer Income) प्राप्त कर सकते हैं। यह बायोफ्लोक तकनीक छोटे जोत वाले किसानों के लिए भी ज्यादा फायदेमंद बताई जा रही है। जानकार लोग भी अब बायोफ्लोक तकनीक से मछली पालन की वकालत कर रहे हैं। जानकारों के मुताबिक बायोफ्लोक तकनीक से खेती(Farming) करने से किसानों को कम जगह में ज्यादा आमदनी आसानी से हो सकेगी।

बायोफ्लोक टेक्नोलॉजी क्या है?

आपकी जानकारी के लिए बता दे कि, बायोफ्लोक एक बैक्टीरिया है, जो मछली के कचरे को प्रोटीन में बदल देता है. यह प्रोटीन मछली द्वारा भी खाया जाता है, जिससे बहुत सारे संसाधन और धन की बचत होती है। इस तकनीक में मछलियों को बड़े टैंकों में पाला जाता है। मछलियों को करीब 10-15 हजार लीटर पानी की टंकियों में रखा जाता है।

इन टैंकों में पानी भरने, गंदा पानी निकालने, पानी को ऑक्सीजन देने की व्यवस्था है। इस तकनीक में किसान मछली पालन के लिए अपनी सुविधा के अनुसार छोटे या बड़े टैंक बना सकते हैं। बायोफ्लोक तकनीक कम पानी में और कम लागत पर बड़ी मात्रा में मछली पालने की अनुमति देती है। इस तकनीक से किसान बिना तालाब खोदे तालाबों में मछली की खेती कर सकते हैं। यह इस तकनीक को किसानों के लिए अधिक फायदेमंद बनाता है।

मछली के अपशिष्ट/मल को प्रोटीन में बदलना-

बायोफ्लोक में मछली पालन में टैंक होते हैं जो पानी से भरे होते हैं और किसान की जरूरत, बाजार की मांग और बजट के अनुसार पाले जाते हैं। यह तरीका तालाब में मछली पालन की तुलना में काफी सस्ता है। टैंक सिस्टम में बायोफ्लोक बैक्टीरिया का उपयोग किया जाता है। ये बैक्टीरिया मछली के मल और व्यर्थ भोजन को प्रोटीन कोशिकाओं में बदल देते हैं और ये प्रोटीन कोशिकाएं मछली के लिए भोजन का काम करती हैं।

दरअसल तालाब की खेती के बाद मछलियों को खाना खिलाया जाता है तो मछलियां उसे खा जाती हैं और उसका 75 फीसदी हिस्सा बेकार हो जाता है. यह कचरा पानी के अंदर अनाज के साथ टैंक के नीचे जमा हो जाता है। इस कचरे के उपचार के लिए बायोफ्लोक का उपयोग किया जाता है। यह बैक्टीरिया मछली के कचरे को प्रोटीन में बदल देता है, जिसे मछलियां खाती हैं। इस प्रकार एक तिहाई चारा बच जाता है। बायोफ्लोक विटामिन और खनिजों, विशेष रूप से फास्फोरस का भी एक अच्छा स्रोत है। यह तकनीक पानी की बचत के साथ-साथ मछली के भोजन की भी बचत करती है।

बायोफ्लोक तकनीक के लाभ –

आपकी जानकारी के लिए हम आपको बताना चाहेंगे कि बायोफ्लोक तकनीक से तिलापिया, मंगुर, केवो, कामंकर जैसी कई मछलियों की प्रजातियों का उत्पादन किया जा सकता है। इस तकनीक से किसान केवल एक लाख रुपये खर्च कर के एक से दो लाख रुपये प्रति वर्ष कमा सकते हैं।

बायोफ्लोक तकनीक में एक टैंक को सिर्फ एक बार बनाने में 70 से 80 हजार रुपये का खर्च आता है। एक टैंक की लाइफ करीब 5 साल होती है। एक टैंक में मछली पालने में करीब 30 हजार रुपए का खर्च आता है और इससे करीब 3 क्विंटल मछली पैदा होती है। मछली पालन साल में दो बार किया जा सकता है। छह महीने बाद मछली पालन से अच्छा लाभ मिलना शुरू हो जाता है।

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