Banana Cultivation : केले की फसल (Banana Crop) एक ऐसा फल है, जिसके सेवन से सेहत अच्छी बनी रहती है। इससे देश-दुनिया में भी केले की मांग बनी हुई है। केले की अच्छी मांग और बाजार भाव (Banana Rate)भी अच्छा होने के कारण यह किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो रहा है। हमारे राज्य में केले की खेती (Banana Farming) बड़े पैमाने पर की जा रही है।

राज्य में किसान अब अच्छा लाभ (Farmer Income) प्राप्त करने के लिए पारंपरिक फसलों के साथ-साथ केले की खेती कर रहे हैं। दोस्तों, हम यहां आपकी जानकारी के लिए बताना चाहेंगे कि, हमारे राज्य के जलगांव जिले में केले की सबसे ज्यादा खेती होती है। लेकिन इसके बावजूद हमारे राज्य के किसानों के साथ-साथ देश के किसान आम किस्मों (Banana Variety) के केले की खेती कर रहे हैं।

लेकिन देश-विदेश में बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए कैवेंडिश समूह के केले की व्यावसायिक खेती भी लाभदायक हो सकती है। दोस्तों हम यहां आपकी जानकारी के लिए बताना चाहेंगे कि केले के कुल उत्पादन का 60% केले के कैवेंडिश समूह पर आधारित है। इस वजह से केले की खेती में भविष्य की तलाश कर रहे किसानों को जानकारों द्वारा कैवेंडिश केले की खेती शुरू करने की सलाह दी जा रही है.

कैवेंडिश समूह केला –

कैवेंडिश समूह के केले उगाने का एक सबसे बड़ा लाभ यह है कि, यह किस्म पनामा विल्ट रोग के प्रति कम संवेदनशील है। वहीं, कैवेंडिश समूह के केले की पैदावार आम किस्मों की तुलना में अधिक होती है। कैवेंडिश समूह के केले को विभिन्न मिट्टी, जलवायु, तकनीकों और जोखिमों के तहत 40 से 50 किलोग्राम प्रति गुच्छा की दर से उगाया जा सकता है।

कैवेंडिश समूह में केले के पौधे कद में बहुत छोटे होते हैं, जिनकी ऊंचाई 1.5 से 1.8 मीटर तक होती है।

इस किस्म के फल भी लंबे और आकार में झुके हुए होते हैं। इसमें हल्के पीले और हरे रंग की छाल होती है। कैवेंडिश समूह के केले का गूदा नरम और मीठा होता है।

एक फल का वजन 20 से 25 ग्राम होता है और एक गुच्छा 120 से 130 फल पैदा करता है।

कैवेंडिश समूह का फसल चक्र 10 से 12 महीने का होता है। इस बीच, फसल प्रबंधन के उन्नत तरीकों को अपनाना होगा।

इन तकनीकों का करें इस्तेमाल-

कैवेंडिश केले की खेती आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और पूर्वी उत्तर प्रदेश में की जाती है, जहां किसान सीमित संसाधनों के साथ भी अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। किसान चाहें तो कैवेंडिश समूह की किस्म से 50 से 70 टन प्रति हेक्टेयर प्राप्त कर सकते हैं। ऐसे अच्छे परिणामों के लिए कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए।

जाहिर है कि,अधिकांश किसान अपने प्रयासों के अनुसार अधिक केले का उत्पादन नहीं कर सकते हैं। अक्सर कीट और रोग का प्रकोप और जलवायु अनिश्चितता केले के उत्पादन को बहुत प्रभावित करती है। ऐसे मामलों में उन्नत बागवानी विधियों को अपनाया जाना चाहिए। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार केले के नए पौधे लगाने के लिए टिश्यू कल्चर्ड रोपों को रोपना चाहिए। इन पौधों में रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है, इसलिए नुकसान की संभावना बहुत कम होती है।

दूसरी ओर खुली सिंचाई से केले के बागों में जलजमाव हो जाता है, जिससे फसल बर्बाद हो जाती है। ऐसी स्थितियों में, ड्रिप सिंचाई का उपयोग फायदेमंद और किफायती होगा। इस तरह सिंचाई और पोषण प्रबंधन के साथ-साथ पानी और अन्य पोषक तत्व फसल तक पहुंचाए जा सकते हैं।

स्वाभाविक रूप से बागवानी फसलों के साथ-साथ केले के बागों में मधुमक्खी पालन का चलन भी बढ़ रहा है। केले के बाग के साथ मधुमक्खी पालन से न केवल फलों की गुणवत्ता में सुधार होगा बल्कि शहद उत्पादन से अतिरिक्त आय (Income) भी होगी।

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