Beed News : भारत गर्व से एक कृषि प्रधान देश होने का खिताब पहनता है। लेकिन बड़ा सवाल अब उठाया जा रहा है कि क्या भारत एक कृषि प्रधान देश है। देश की आधी से अधिक आबादी कृषि पर आधारित है और भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि क्षेत्र पर निर्भर है, इसलिए भारत को एक कृषि प्रधान देश का खिताब प्राप्त है।

हम भी बड़े गर्व के साथ इसकी महिमा करते हैं। लेकिन हमारे भारत जैसे कृषि प्रधान देश में आजादी के लगभग आठ दशक बाद भी अगर बलीराजा को आत्महत्या करनी पड़ती है, तो क्या हमारा देश वास्तव में कृषि प्रधान है? यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। हाल ही में किसान आत्महत्या का एक आंकड़ा सामने आया है। ये आंकड़े दिल दहला देने वाले हैं।

इन आंकड़ों के मुताबिक अकेले मराठवाड़ा के बीड जिले में 240 किसान भाइयों ने महज नौ महीने में अपनी जीवन यात्रा समाप्त कर ली है| यानी हर दो दिन में एक किसान भाई फांसी के फंदे पर लटक रहा है| जिले की यह भयावह हकीकत निश्चित रूप से सत्ता पक्ष, विपक्ष, सामाजिक सरोकार और आम जनता के लिए विचारोत्तेजक मुद्दा है।

अब किसान भाई फांसी लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त नहीं करेंगे क्योंकि वे मूड में हैं। इसके पीछे जरूर कोई ठोस वजह है। दिलचस्प बात यह है कि इन कारणों को यहां उजागर करने का कोई कारण नहीं है। क्योंकि किसान आत्महत्या के पीछे के सभी कारणों को सभी जानते हैं। कृषि बंजरता, ऋणग्रस्तता, बैंक ऋण चुकाने में बाधा और सबसे महत्वपूर्ण, कटाई के बाद कम बिक्री मूल्य किसानों को हताश कर रहे हैं।

इन तमाम तर्कों से किसानों को आत्महत्या के अलावा कोई दूसरा विकल्प नजर नहीं आता। इसलिए किसानों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए सरकार के लिए यह अनिवार्य हो गया है कि उदासीन नीति के स्थान पर उन्हें पर्याप्त सहायता प्रदान की जाए या उनके लिए कोई ठोस नीति बनाई जाए। अकेले बीड जिले में 1 जनवरी से 16 नवंबर, 2022 तक 240 किसानों ने आत्महत्या की है।

यह आँकड़ा निश्चित रूप से चिंताजनक है। इन आँकड़ों से सरकार की विभिन्न योजनाओं और घोषित की जाने वाली सब्सिडी के तमाम पहलू कागजों पर ज़रूर नज़र आते हैं या फिर सरकार द्वारा घोषित योजनाओं और सब्सिडी से कहीं न कहीं किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं हो पाता है।

इस साल अक्टूबर में आईन सनसुदी यानी दिवाली के दौरान जिले में सबसे ज्यादा 35 किसान आत्महत्याएं हुईं। अर्थात बलिराजा की कृपा से लड्डू, चकली, चिवड़ा, पोली जैसे मिष्ठान तो हम खाते ही थे, पर बलिराजा अपनी जीविका कैसे प्राप्त करें इस दुविधा के कारण फाँसी के फंदे से लटके हुए थे।

निश्चय ही कृषि प्रधान देश के लिए यह शर्मनाक और शर्मसार करने वाली घटना है। दिलचस्प बात यह है कि देश के अन्य राज्यों की तुलना में महाराष्ट्र में किसान आत्महत्याओं की संख्या अधिक हृदय विदारक है। इस साल भारी बारिश और लगातार बारिश से खरीफ सीजन बर्बाद हो गया। इससे किसान काफी मानसिक तनाव में थे।

इस बीच, जिले में किसान आत्महत्याओं की संख्या में भी वृद्धि हुई है। माहवार आंकड़ों पर गौर करें तो 18 जनवरी, 24 फरवरी, 29 मार्च, 15 अप्रैल, 22 मई, 30 जून, 17 जुलाई, 23 अगस्त, 18 सितंबर, 35 अक्टूबर और 18 नवंबर को किसानों ने अपनी जीवन यात्रा समाप्त कर ली है। प्राप्त जानकारी के अनुसार जिला समिति की बैठक में बीड जिला प्रशासन द्वारा 240 किसान आत्महत्या के मामलों में से 169 को पात्र घोषित किया गया है और मृतक के वारिसों को सरकार द्वारा 1 लाख रुपये की सहायता राशि दी जाएगी|

हालांकि, किसान आत्महत्या के शेष 43 मामलों को सरकारी सहायता के लिए अपात्र घोषित किया गया है, जबकि 34 मामले जांच के लिए लंबित हैं। अगर समग्र स्थिति पर नजर डालें तो किसान आत्महत्या भी कर लेता है तो उसके परिवार के लिए सनस की ओर से पर्याप्त धन की व्यवस्था नहीं होती है। खासकर अगर किसान आत्महत्या करते हैं तो अपात्र मामले भी सामने आते हैं।

बेशक यह प्रशासनिक कार्य और नियमों का हिस्सा हो सकता है। हालाँकि, यह भी तय है कि कृषि प्रधान देश में किसान आत्महत्या किसान आत्महत्या नहीं है, यह एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि क्या हमारा देश वास्तव में एक कृषि प्रधान देश है या हम इसे ढोंग कर रहे हैं।

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