Fennel Cultivation : सौंफ एक ऐसा लाजवाब और खुशबूदार मसाला है कि इसे न सिर्फ तरह-तरह के व्यंजन और अचार में इस्तेमाल किया जाता है बल्कि चबाकर भी खाया जाता है। भारत में सौंफ मुख्य रूप से राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश में उगाई जाती है।

लेकिन इसके बावजूद किसानों ने विदर्भ में सौंफ की खेती का प्रयोग किया है और इससे उन्हें ज्यादा कमाई हो रही है। सौंफ का विभिन्न व्यंजनों में मसाले के रूप में प्रयोग होने तथा इसके आयुर्वेदिक व औषधीय गुणों के कारण बाजार में काफी मांग है।

सभी मसालों की तरह सौंफ भी एक नकदी फसल है और इसकी उन्नत किस्में उत्पादन लागत से एक-चौथाई से ढाई गुना अधिक कीमत पर बिकती हैं। तो अब हम जानेंगे सौंफ की उन्नत किस्मों के बारे में।

सौंफ की उन्नत किस्मों की farming करें

सौंफ लंबी अवधि की फसल मानी जाती है।इसकी बुवाई के लिए शरद ऋतु का पहला सप्ताह अक्टूबर से नवंबर तक अच्छा माना जाता है। सौंफ की उपज और गुणवत्ता के लिए जनवरी से मार्च तक शुष्क और मध्यम ठंडी जलवायु बहुत फायदेमंद होती है। फूलों के दौरान इसके पौधों को पाले से बचाना आवश्यक है।

बादल वाले दिनों की संख्या में वृद्धि या ठंड के दिनों में उच्च आर्द्रता सौंफ पर रोगों की घटनाओं को बढ़ा सकती है।सौंफ की फसल 140 से 160 दिनों में पक जाती है, जबकि कुछ किस्में 200 से 225 दिनों में पक जाती हैं। इसके चलते सौंफ की उन्नत एवं जल्दी पकने वाली किस्मों की बुआई करनी चाहिए।

जल्दी पकने वाली और अधिक उपज देने वाली किस्में

जोधपुर कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों के अनुसार आरएफ 125, आरएफ 143 और आरएफ 101 नाम की किस्में किसानों के लिए काफी फायदेमंद साबित हुई हैं. इन्हें 2005 और 2007 के बीच विकसित किया गया और किसानों को उपलब्ध कराया गया।

RF 125 (2006) – इस किस्म के पौधे कम ऊंचाई के होते हैं। इनके पुष्पक्रम घने, लंबे, सुडौल और आकर्षक दानों से भरे होते हैं। यह नस्ल जल्दी परिपक्व होती है। इसकी औसत उपज 17 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।

RF 143 (2007) – इस किस्म के पौधे सीधे बढ़ते हैं और 116-118 सेंटीमीटर की ऊंचाई तक पहुंचते हैं। जिस पर 7-8 शाखाएं निकलती हैं। इसका पुष्पक्रम सघन होता है। प्रति पौधे छत्रों की संख्या 23-62 होती है। यह किस्म 140-150 दिनों में पक जाती है। इसकी औसत उपज 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।इसमें 1.87 प्रतिशत वाष्पशील तेल होता है।

RF 101 (2005) – यह किस्म चिकनी मिट्टी और काली दोमट मिट्टी के लिए उपयुक्त है। यह 150-160 दिनों में पक जाती है। इसके पौधे सीधे और मध्यम ऊंचाई के होते हैं। इसकी औसत उपज 15-18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। इसमें 1.2 प्रतिशत वाष्पशील तेल होता है। इस नस्ल में रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है।

 

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