Farmer Success Story : किसान अब कृषि व्यवसाय से थक चुके हैं क्योंकि उन्हें कृषि में लगातार घाटा उठाना पड़ रहा है। कई किसान चाहते हैं कि उनकी अगली पीढ़ी कृषि में प्रवेश न करे।

इसी के अनुरूप वे अपने बच्चों को बेहतर उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित कर रहे हैं और उनके बेटे-बेटियां उच्च शिक्षा के बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों में या सरकारी कर्मचारी के रूप में काम करने का सपना देख रहे हैं।

हालांकि देश में ऐसे कई पढ़े-लिखे लोग हैं जिन्होंने अपनी पढ़ाई-लिखाई को खेती के काम में लगा दिया है. साथ ही कई पढ़े-लिखे कामगार भी हैं जिन्होंने अपने काम के साथ-साथ कृषि व्यवसाय को भी अपनाया है।

आज हम बीड जिले की एक ऐसी ही अवलिया के बारे में जानने जा रहे हैं जिसने अपने चिकित्सा पेशे को कायम रखते हुए खेती शुरू की और कम लागत में अधिक कमाई की कीमिया हासिल की। आज हम जिस डॉक्टर के बारे में जानने जा रहे हैं उन्होंने अपने चिकित्सा सेवा धर्म की खेती करते हुए परंपरागत कृषि के साथ-साथ बागों की खेती कर अच्छी आमदनी अर्जित की है।

बीड जिले के शिरूर कसार तालुका के डॉक्टर सुनील कसूले ने यह कीमिया हासिल की है। शहर के पास अपनी सूखी जमीन में केसर आम, सीताफल, गेंदा की फसल से उन्होंने अच्छी कमाई की है।

खुद एक डॉक्टर होने के नाते उन्हें रासायनिक खादों से पैदा होने वाले कृषि उत्पादों से होने वाले मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले हानिकारक प्रभावों की अच्छी जानकारी है, इस वजह से उन्होंने सबसे पहले रासायनिक खादों को छोड़ जैविक खेती की। उन्होंने बेहतर फसल उत्पादन के लिए गाय के गोबर और वर्मीकम्पोस्ट का जैविक रूप से उपयोग कर कृषि उपज का उत्पादन कर दूसरों के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में काम किया है।

तीन साल पहले डॉक्टर साहब ने बरशी से सुनहरी किस्म के सीताफल के पौधे मंगवाए और उन्हें अपने खेत में लगाया और अंतरफसल के रूप में गेंदा लगाया। उन्होंने दो साल पहले केसर आम का पौधा भी मंगवाया था और इस आम के बाग में खरबूजे की इंटरक्रॉप की थी।

इसके साथ ही वे अरहर, सोयाबीन, मूंग और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों से भी अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने पानी की आपूर्ति के लिए अपने जंगल में एक खेत तालाब खोदा है और फसलों को पानी देने के लिए ड्रिप सिंचाई प्रणाली का इस्तेमाल किया है। इस बीच, इस साल उनके द्वारा लगाए गए फलों के बगीचे में उपज आने लगी है।

चूंकि उन्होंने जैविक रूप से सीताफल का उत्पादन किया है, इसलिए बाजार में इसकी अच्छी मांग है और उन्हें 60 से 80 रुपये प्रति किलो की दर मिल रही है। एक पेड़ से 5 से 7 किलो सीताफली का उत्पादन किया गया है। इससे उन्हें करीब साढ़े तीन टन उत्पाद मिलेगा और दो लाख तक की कमाई होगी।

बेशक, पैदावार कम है क्योंकि वर्तमान में पेड़ छोटे हैं, लेकिन भविष्य में पैदावार बढ़ेगी। साथ ही, वे इस बात से भी खुश हैं कि उपज का उत्पादन जैविक रूप से किया गया है। डॉक्टर साहब द्वारा कृषि में किया गया यह चमत्कार दूसरों के लिए मार्गदर्शक होगा और अन्य किसानों को भी डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए और कृषि में इस तरह का आमूल-चूल परिवर्तन कर सफलता के शिखर पर पहुंचना चाहिए।

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